Notification

×

Pronews20

Pronews13

Label

Desktop-Top-Ads-Image

Mobile-Top-Ads-Image

कानूनी दांव-पेंच और सटीक जिरह से मिली जीत: अधिवक्ता प्रसून बिरथरे की बड़ी कामयाबी

Friday, 10 April 2026 | April 10, 2026 IST Last Updated 2026-04-10T09:24:44Z

इंदौर: इंदौर के एक अत्यंत जटिल पॉक्सो (POCSO) प्रकरण में, जहाँ परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रथम दृष्टया अभियुक्त के प्रतिकूल प्रतीत हो रहे थे, वहीं अधिवक्ता प्रसून बिरथरे ने अपनी उच्च स्तरीय विधिक निपुणता, सटीक जिरह और तार्किक विश्लेषण के माध्यम से मामले की दिशा ही परिवर्तित कर दी।

साक्ष्यों की विधिक कसौटी पर परख
बचाव पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी करते हुए अधिवक्ता बिरथरे ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत विद्यालयी अभिलेखों (School Records) की प्रमाणिकता एवं विश्वसनीयता को चुनौती दी। उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह दृढ़ता से प्रतिपादित किया कि बिना जन्म प्रमाण पत्र या अन्य प्रामाणिक दस्तावेजों के, केवल स्कॉलर रजिस्टर (Scholar Register) के आधार पर आयु निर्धारित करना विधि सम्मत नहीं माना जा सकता।

तीक्ष्ण जिरह ने कमजोर की अभियोजन की नींव
गवाहों से की गई अधिवक्ता बिरथरे की सूक्ष्म एवं तार्किक जिरह (Cross-Examination) ने अभियोजन पक्ष के दावों की नींव हिला दी। जिरह के दौरान सामने आए विरोधाभासों के कारण अभियोजन पक्ष कथित पीड़िता की आयु को "संदेह से परे" सिद्ध करने में पूर्णतः विफल रहा।

अधिवक्ता बिरथरे ने उच्चतम न्यायालय के स्थापित न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि:
  • आयु में “मामूली अंतर” (Marginal Difference) की स्थिति में संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) सदैव अभियुक्त को मिलना चाहिए।
  • आपराधिक न्यायशास्त्र में “संदेह से परे प्रमाण” (Proof Beyond Reasonable Doubt) एक अनिवार्य तत्व है।
न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
माननीय न्यायालय ने बचाव पक्ष के तर्कों से सहमति व्यक्त करते हुए यह स्वीकार किया कि उपलब्ध साक्ष्यों के अभाव में पीड़िता को वयस्क (Adult) माना जा सकता है। आयु संबंधी इसी महत्वपूर्ण मोड़ ने अभियोजन के संपूर्ण प्रकरण को प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने अभियुक्त को दोषमुक्त (Acquitted) करार दिया।

सफलता का मंत्र (अधिवक्ता दृष्टिकोण)
अपनी इस महत्वपूर्ण सफलता पर अधिवक्ता प्रसून बिरथरे ने कहा:

    “विधि भावनाओं के प्रवाह पर नहीं, अपितु साक्ष्यों की दृढ़ता और उनके तार्किक परीक्षण पर आधारित होती है। न्यायालय के समक्ष प्रत्येक तथ्य को विधिक कसौटी पर परखना ही अधिवक्ता का परम कर्तव्य है। आपराधिक मामलों में संदेह का लाभ अभियुक्त को मिलना न्याय का मूल सिद्धांत है।”

इस ऐतिहासिक निर्णय के पश्चात इंदौर उच्च न्यायालय एवं जिला न्यायालय के विधिक विशेषज्ञों के मध्य अधिवक्ता प्रसून बिरथरे की कार्यशैली, उनकी सूक्ष्म जिरह कला एवं गहन कानूनी समझ की व्यापक सराहना की जा रही है।

Video

Video

देश ~

[style2 label="National" results="6" text="National"]

विदेश ~

[style3 label="International" results="6" text="International"]

राज्य स्तरीय ~

[style2 label="State-Level-News" results="6" text="State-Level-News"]

राजनीति ~

[style3 label="Politics" results="6" text="Politics"]

आर्थिक ~

[style2 label="Economic" results="6" text="Economic"]

अपराध ~

[style3 label="Crime" results="6" text="Crime"]

स्वास्थ्य ~

[style2 label="Health" results="6" text="Health"]

शिक्षा ~

[style3 label="Education" results="6" text="Education"]

खेल ~

[style2 label="Sports" results="6" text="Sports"]

मनोरंजन ~

[style3 label="Entertainment" results="6" text="Entertainment"]

धार्मिक ~

[style2 label="Devotional" results="6" text="Devotional"]

विधिक ~

[style3 label="Legal-Affairs" results="6" text="Legal-Affairs"]

अन्य ~

[style2 label="Other-Content" results="6" text="Other-Content"]